स्वार्थ: क्या हम सच में जी रहे हैं?

हम जी रहे हैं?

या केवल खा रहे हैं, सो रहे हैं और अपने छोटे-से स्वार्थ के घेरे में घूम रहे हैं?

यदि जीवन केवल पेट भरने और अपने सुख की व्यवस्था करने तक सीमित है, तो फिर मनुष्य और पशु में अंतर क्या रह गया?

पशु भी खाते हैं, सोते हैं, अपने शरीर की रक्षा करते हैं।

यदि हमारा जीवन भी बस इतना ही है, तो हमारी चेतना अभी जागी नहीं है।

मनुष्य होने का अर्थ क्या है?

मनुष्य होने का अर्थ है—अपने से आगे बढ़ना, अपने छोटे “मैं” के पार जाना।

लेकिन हमने जीवन को सिकोड़ लिया है।

“मेरा घर, मेरा परिवार, मेरा लाभ…”

बस यही हमारी परिधि बन गई है।

और इस छोटे-से घेरे में हम स्वयं को सुरक्षित मान लेते हैं।

लेकिन क्या यह सुरक्षा है?

या यह एक सूक्ष्म कैद है?

स्वार्थ की सीमा से बाहर निकलना

जब तक हमारा जीवन केवल हमारे लिए है, तब तक वह अधूरा है।

क्योंकि चेतना का स्वभाव है—

“फैलना, बाँटना, देना।”

हमने कभी अनुभव किया होगा, जब हम किसी की मदद करते हैं, बिना किसी स्वार्थ के… भीतर कुछ खिल उठता है।

एक ऐसा आनंद, जो किसी वस्तु से नहीं मिलता।

वही संकेत है कि हम सही दिशा में कदम रख रहे हैं।

जब हम बिना किसी स्वार्थ के किसी के जीवन में थोड़ा-सा प्रकाश जोड़ते हैं, तो हमारे भीतर भी कुछ प्रकाशित होता है।

सेवा: चेतना का विस्तार

समाज की सेवा कोई बोझ नहीं है। यह हमारी चेतना की आवश्यकता है।

जब हम केवल अपने सुख, अपने लाभ और अपनी सुविधाओं के बारे में सोचते रहते हैं, तो धीरे-धीरे हमारी दुनिया छोटी होती जाती है।

इसके विपरीत, जब हम दूसरों के दुख को समझने लगते हैं, किसी की सहायता करते हैं, किसी के चेहरे पर मुस्कान लाने का प्रयास करते हैं, तब हमारी चेतना अपने छोटे घेरे से बाहर निकलने लगती है।

जो इसे नहीं समझता, वह धीरे-धीरे भीतर से सूखने लगता है, चाहे बाहर से कितना भी सफल क्यों न दिखाई दे।

धन, सुविधा और उपलब्धियाँ जीवन का हिस्सा हो सकती हैं, लेकिन केवल इन्हीं को जीवन का उद्देश्य बना देना भीतर एक खालीपन छोड़ सकता है।

स्वार्थ में जीने वाला जीवन

स्वार्थ में जीने वाला जीवन अंततः खाली रह जाता है।

बहुत कुछ इकट्ठा हो जाता है, लेकिन भीतर कुछ भी नहीं बचता।

हम चीजें जमा करते रहते हैं—धन, वस्तुएँ, उपलब्धियाँ, प्रतिष्ठा और सुविधाएँ। लेकिन जीवन का वास्तविक मूल्य केवल इस बात से तय नहीं होता कि हमने कितना अपने लिए इकट्ठा किया।

कई बार जीवन की सबसे गहरी संतुष्टि उस क्षण में मिलती है जब हम किसी ऐसे व्यक्ति के काम आते हैं जो हमें बदले में कुछ देने की स्थिति में भी नहीं है।

वहीं से सेवा का भाव जन्म लेता है। और सेवा धीरे-धीरे स्वार्थ की सीमाओं को विस्तृत कर सकती है।

तो प्रश्न यह नहीं है कि हम कितना कमा रहे हैं, कितना जोड़ रहे हैं।

प्रश्न यह है….

हम कितना बाँट रहे हैं?

क्योंकि अंत में वही हमारे साथ रहेगा, जो हमने दिया है।

बाकी सब यहीं छूट जाएगा।

अस्तु…..

आइए,

थोड़ा रुकें…
थोड़ा देखें…
और
इस जीवन को केवल अपने लिए नहीं,
थोड़ा-सा सबके लिए भी जीना शुरू करें।

~ प्रभात पांडेय