सात चक्र: कुंडलिनी के सात चक्रों के नामों में छिपा गहरा अर्थ
मूलाधार से सहस्रार तक चेतना की एक आध्यात्मिक यात्रा
तुमने कुंडलिनी के सात चक्रों के बारे में खूब सुना होगा।
और सोशल मीडिया पर इनको बैलेंस, शोधन और जागरण के बड़े-बड़े दावे भी सुने होंगे।
आज एक छोटी झलक सबको दिखाता हूँ।
क्या तुमने इन चक्रों के नाम पर गौर किया?
कभी सोचा कि इनके यही नाम क्यों हैं?
सनातन में जो कुछ भी है, उसके पीछे हमेशा एक गहरा अर्थ जरूर छिपा होता है।
तो आज हम इन नामों के अर्थों को ही समझ लें, तो बात कुछ-कुछ पकड़ में आएगी।
मूलाधार चक्र
सबसे निचला चक्र है मूलाधार।
मूलतः यही आधार है हमारे होने का…
इस सृष्टि के होने का…
सृष्टि चाहती है फैलना,
संख्या वृद्धि।
यह मूलाधार हम सभी में जाग्रत अवस्था में रहता है।
इसी से हमें विपरीत लिंगी आकर्षण होता है।
दूसरी देह में सुख है, ऐसा भान होता है और हम प्रजनन में लगे रहते हैं।
कभी किसी-किसी विरले की कुंडलिनी अधोमुखी से ऊर्ध्वमुखी हो जाए…
किसी संत की कृपा हो जाए,
जन्मों-जन्मों का पुण्य उदय हो जाए,
तो यह घटना घटती है।
तब अगले चक्र पर हम पहुँचते हैं।
स्वाधिष्ठान चक्र
स्वाधिष्ठान यानी हम (स्व) जहाँ वास्तव में रहते हैं (अधिष्ठान)।
यह हमारी वास्तविक जगह है।
यहाँ पहुँचने के बाद ही हमें पता लगता है कि हम हैं कौन…
उससे पहले सब हवा-हवाई बातें हैं।
सब माया-जाल है।
जैसे प्रकृति हमें चलाए, हम चल रहे हैं।
वह जैसा हमें मोड़ देती है, हम मुड़ जाते हैं।
संसार के सुख-दुःख को भोगते हैं और सुखी या दुखी होते हैं।
अपने सही स्वरूप से हमारा खुद का कभी परिचय भी नहीं होता।
अब यहाँ विपरीत लिंगी मिलता भी है, तो भी, उसके शरीर के साथ-साथ उसकी अंतरात्मा से भी परिचय होता है।
चीजें पहले से बहुत अधिक स्पष्ट हो जाती हैं।
जीवन का उद्देश्य समझ आने लगता है।
मणिपुर चक्र
अगला चक्र आता है मणिपुर।
ये भला कैसा नाम है?
मणि में इतना उजाला होता है कि सब कुछ स्पष्ट दिखाई देने लगता है। आप अब जिस जगत में पहुँच चुके हैं, वहाँ चारों ओर मणियों का उजाला बिखरा है।
अब भ्रम की कोई गुंजाइश नहीं है।
खुद को आप पिछले चक्र पर ही जान चुके थे। अब समस्त जगत को ठीक से समझ पाने की स्थिति में आ चुके हैं।
उसके लिए भरपूर प्रकाश की आवश्यकता होती है, जो अब आपके पास है।
अनाहत चक्र
अगला चक्र है अनाहत।
आहत माने चोट।
अ माने नहीं।
बिना किसी चोट के कोई भी ध्वनि उत्पन्न नहीं होती।
किन्तु इस चक्र पर जाने पर आपके अंदर एक ध्वनि लगातार गूँजने लगती है,
जो कि बिना किसी टकराहट के अंदर ही उत्पन्न होती है।
ये ब्रह्मांड के अज्ञात क्षेत्रों से आती हुई आवाजें हैं, जो आपके अंदर के व्यक्तित्व को धीरे-धीरे पूरी तरह से बदल देंगी।
आनंद की एक विचित्र सी लहर आपके भीतर डोलती रहेगी।
विशुद्धि चक्र
अब पहुँचते हैं अगले चक्र पर, जिसका नाम है विशुद्धि चक्र।
इस चक्र पर आपका शोधन शुरू होता है।
जो व्यक्तित्व पिछले चक्र पर बदला गया था,
अब उस व्यक्तित्व का परिष्कार किया जाएगा।
उसको शुद्ध किया जाएगा।
ब्रह्मांड आपको एक महाशक्ति बनाने की तैयारी कर रहा है।
अब आप सामान्य व्यक्ति नहीं हैं।
आप महामानव बन चुके हैं।
आज्ञा चक्र
अगला चक्र है आज्ञा चक्र।
अब यह ब्रह्मांड आपकी आज्ञा मानने के लिए तैयार है।
अब सामान्य मानवीय नियम आप तोड़ सकते हैं।
जिनको लोग असाधारण चमत्कार मानते हैं, वो आप चुटकियों में कर सकते हैं।
समस्त ब्रह्मांड आपकी आज्ञा के अधीन हो जाता है।
सहस्रार चक्र
अब अगले चक्र पर पहुँचते हैं, जिसका नाम है सहस्रार चक्र।
ये वो स्थान है जहाँ पहुँचकर आपकी मुलाकात महाशिव से होती है।
सहस्र का मतलब होता है हज़ारों।
सार का अर्थ है निचोड़।
यहाँ आप पाएँगे कि हज़ारों ब्रह्मांड हैं और सबमें अलग-अलग लीला चल रही है।
और उन सब का निचोड़ जो है उस तक आप पहुँच चुके हो।
अब इतना पढ़ने के बाद आपको तब बहुत हँसी आएगी, जब कोई कहेगा—
“मैं आपकी आज्ञा चक्र जाग्रत कर दूँगा।”
या—
“मैं कुंडलिनी को कुछ पैसे लेकर जाग्रत कर दूँगा।”






