अष्टांग योग — भाग 2
यम से समाधि तक — अष्टांग योग की संपूर्ण यात्रा
महर्षि पतंजलि के अष्टांग योग के आठ अंगों को समझने की एक सरल यात्रा
प्रिय मित्र,
पिछले लेख में हमने बात की थी कि आज हर तरफ ध्यान की चर्चा है, लेकिन क्या ध्यान तक पहुँचने से पहले स्वयं को उस अनुभव के योग्य बनाया है?
महर्षि पतंजलि ने योग को केवल ध्यान की एक तकनीक नहीं बनाया। उन्होंने मनुष्य के भीतर की यात्रा का एक पूरा क्रम दिया
यह यात्रा बाहर से भीतर की ओर जाने की यात्रा है।
आइए, इसे थोड़ा सरलता से समझते हैं।
पहला अंग — यम
यम के पाँच अंग हैं
1. सत्य
अधिकांश समय सत्य बोलें।
अपनी गलती को सहजता से स्वीकार करें और उसे दोबारा न करने का संकल्प लें।
बल्कि यहीं से व्यक्तित्व में निखार आना शुरू होता है।
जब हम स्वयं से भी झूठ बोलना बंद कर देते हैं, तभी भीतर की यात्रा प्रारंभ होती है।
2. अहिंसा
किसी को दुःख देने का भाव हिंसा है।
यह केवल शरीर से नहीं होती। हिंसा के तीन रूप हैं
मन में किसी का अहित चाहना…
वाणी से किसी को चोट पहुँचाना…
और कर्म से किसी को दुःख देना…
ये सभी हिंसा के रूप हैं।
ध्यान में आगे बढ़ना है तो केवल शरीर को शांत करना पर्याप्त नहीं।
मन, वचन और कर्म—तीनों में अहिंसा का अभ्यास आवश्यक है।
3. अस्तेय
मन से, वचन से और कर्म से चोरी न करना ही अस्तेय है।
किसी की वस्तु मुझे मिल जाए
ऐसी भावना रखना भी चोरी की ओर ले जाती है।
किसी दूसरे को गलत कार्य के लिए प्रेरित करना भी अस्तेय के भाव से जुड़ता है।
यहाँ तक कि अपने ही घर में चुपके से कोई वस्तु अकेले खा लेना और दूसरों से छिपाना भी उसी वृत्ति को दिखाता है।
मैं मन, वचन और कर्म से किसी ऐसी वस्तु को ग्रहण नहीं करूंगा जो मेरी नहीं है।
4. अपरिग्रह
अपरिग्रह केवल वस्तुएँ कम रखने का नाम नहीं है।
यह भीतर के भरोसे से जुड़ा है।
जब हम आवश्यकता से बहुत अधिक चीजें इकट्ठी करते जाते हैं, तो कहीं न कहीं भीतर यह भय भी छिपा होता है कि
अपरिग्रह हमें सिखाता है..
संग्रह कम होगा तो भीतर स्थान बनेगा।
5. ब्रह्मचर्य
मनुष्य की इच्छाएँ असीम हैं।
मनुष्य ने अपनी प्रकृति को भी ऐसा बना लिया है कि कामना कभी भी जाग सकती है।
केवल शारीरिक रूप से कामभाव में जाना ही ब्रह्मचर्य का विषय नहीं है।
मानसिक रूप से लगातार कामभाव में जीना भी उसी वृत्ति का हिस्सा है।
ब्रह्मचर्य का अर्थ काम से भागना नहीं है।
कामना का दमन भी समाधान नहीं।
दूसरा अंग — नियम
नियम के भी पाँच अंग हैं—
1. शौच
सामान्य अर्थ में शौच का अर्थ है
शरीर को बाहर और भीतर से स्वच्छ करना।
बाहरी स्नान से शरीर बाहर से स्वच्छ होता है।
योग परंपरा में शरीर की आंतरिक शुद्धि के लिए वमन, विरेचन, बस्ति, नेति आदि विभिन्न शोधन प्रक्रियाओं का वर्णन मिलता है।
लेकिन क्या केवल शरीर की सफाई ही पर्याप्त है?
मन को भी प्रतिदिन स्नान चाहिए।
इसके लिए तीन बातें अत्यंत महत्वपूर्ण हैं..
प्रतिदिन प्रसन्नचित्त रहने का अभ्यास करें।
किसी ने उचित ही कहा—उसे मन से क्षमा करें।
और हर दिन ईश्वर को धन्यवाद दें।
किसी ने आपके लिए थोड़ा भी सहयोग किया हो, उसे भी हृदय से धन्यवाद दें।
2. संतोष
आज पूरी दुनिया के मन में जो उथल-पुथल दिखाई देती है, उसके पीछे असंतोष की बड़ी भूमिका है।
हमें जो मिला है, उसके प्रति धन्यवाद करने के बजाय हमारा मन लगातार उस चीज़ के पीछे भागता है जो अभी मिली नहीं है।
अपने ऊपर ध्यान केंद्रित कीजिए। जो मिला है, उसके प्रति ईश्वर को धन्यवाद दीजिए।
3. तपस
तपस्या शब्द से ही तपस बना है। साधारण अर्थ में तप का अर्थ है
अपने भीतर की कुप्रवृत्तियों को तपाना, उन्हें धीरे-धीरे क्षीण करना।
इसकी शुरुआत हम कुछ समय के मौन से कर सकते हैं।
मौन केवल मुँह का नहीं, मन का भी।
कुछ समय शांत बैठिए।
विचार आएँ तो आने दें।
विचार जाएँ तो जाने दें।
न विचारों से लड़ें, न उनके साथ बहें।
बस देखते रहें।
यही देखने की क्षमता धीरे-धीरे हमें अपनी अन्य वृत्तियों को भी देखने में सहायता करती है।
4. स्वाध्याय
साधारण अर्थ में स्वाध्याय का अर्थ है अपने शास्त्रीय ग्रंथों का नियमित अध्ययन।
हर व्यक्ति को कम से कम भगवद्गीता का अध्ययन अवश्य करना चाहिए।
एक दिन में केवल एक श्लोक ही क्यों न पढ़ें। लेकिन पढ़े
साथ ही स्वाध्याय का एक और गहरा अर्थ है
स्व + अध्ययन
अर्थात स्वयं का अध्ययन।
मैं कौन हूँ?
मेरी वृत्तियाँ क्या हैं?
मेरी इच्छाएँ कहाँ से आती हैं?
मेरे भीतर क्रोध क्यों उठता है?
मुझे भय किससे लगता है?
स्वाध्याय केवल पुस्तक पढ़ना नहीं है। अपने भीतर लिखे हुए ग्रंथ को पढ़ना भी स्वाध्याय है।
5. ईश्वर-प्रणिधान
प्रणिधान का अर्थ है—पूर्ण समर्पण।
अपने प्राणों तक को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देने का भाव।
हर श्वास में उनका स्मरण हो। अधिकांश समय भीतर उनका नाम चलता रहे।
और सबसे महत्वपूर्ण हम जो भी कार्य करें, उसमें कर्ता-भाव धीरे-धीरे कम होता जाए।
जो कार्य मुझे मिला है, वह ईश्वर की ओर से मिला है।
मुझे उसे पूरी निष्ठा से करना है।”
अक्सर हम पूजा में भी भगवान से कुछ न कुछ माँगते रहते हैं।
ईश्वर-प्रणिधान हमें एक दूसरी दिशा दिखाता है
ईश्वर जो परिस्थिति दें, उसमें प्रसन्न रहना और उसे स्वीकार करके अपना कर्म करना।
यही समर्पण की दिशा है।
तीसरा अंग — आसन
अष्टांग योग में आसन का अर्थ केवल तरह-तरह के शारीरिक आसनों से नहीं है।
अर्थात ऐसा आसन जिसमें शरीर स्थिर और सहज रहे।
किसी भी उपयुक्त आसन में बिना हिले-डुले, शांत भाव से बैठने का अभ्यास करें।
तक ले जाने का अभ्यास किया जा सकता है।
आसन का उद्देश्य केवल शरीर को मोड़ना नहीं।
शरीर को इतना स्थिर करना है कि आगे की यात्रा में वह बाधा न बने।
चौथा अंग — प्राणायाम
प्राणायाम शब्द को प्राण + आयाम के रूप में समझा जाता है।
जीवन की ऊर्जा
विस्तार या नियमन
श्वास के माध्यम से प्राण के साथ कार्य करना प्राणायाम की साधना का महत्वपूर्ण भाग है।
नाड़ी शोधन जैसे प्राणायाम नियमित और उचित विधि से किए जा सकते हैं।
इसे सही विधि, उचित क्रम और अपनी क्षमता के अनुसार करना चाहिए।
पाँचवाँ अंग — प्रत्याहार
प्रत्याहार दो शब्दों से बना है
अर्थात इंद्रियों के आहार से भीतर की ओर लौटना।
हमारी इंद्रियाँ निरंतर विषयों की ओर दौड़ती रहती हैं।
सुनना है…
चखना है…
पाना है…
भोगना है…
और इच्छाएँ?
वे समाप्त होने का नाम ही नहीं लेतीं।
प्रत्याहार का अर्थ है—इन विषयों से विवेकपूर्वक दूरी बनाना।
प्राणायाम से साधक की आंतरिक तैयारी होती है और विषयों के प्रति उसकी पकड़ को कमजोर करने में सहायता मिल सकती है।
लेकिन प्रत्याहार के लिए केवल तकनीक पर्याप्त नहीं।
विवेक और अनुशासन दोनों चाहिए।
छठा अंग — धारणा
धारणा ध्यान की प्रारंभिक अवस्था है।
यह “धृ” धातु से बना शब्द है, जिसका अर्थ है—धारण करना, पकड़कर रखना।
धारणा है।
श्वास पर लगातार ध्यान देना…
मस्तक के किसी बिंदु पर ध्यान रखना…
आते-जाते विचारों को देखना…
या सामने रखी किसी वस्तु अथवा चित्र पर कुछ समय तक ध्यान टिकाए रखना…
ये सभी एकाग्रता के अभ्यास के रूप हो सकते हैं।
धारणा का निरंतर अभ्यास चित्त को एकाग्र होने की दिशा में ले जाता है।
किसी दिन ध्यान प्रयास से नहीं, सहज रूप से घट सकता है।
धारणा ध्यान को बुलाने का प्रयास नहीं है।
धारणा स्वयं को उस अवस्था के लिए तैयार करना है जहाँ ध्यान घटित हो सके।
सातवाँ अंग — ध्यान
यहाँ आकर एक बहुत सुंदर बात सामने आती है…
ध्यान अपने आप घटित होता है।
यह प्रेम जैसा है।
क्या आपने कभी प्रेम को आदेश देकर पैदा किया है?
नहीं।
वह घटता है।
उसी प्रकार जब चित्त पर्याप्त रूप से तैयार होता है, तो ध्यान घटित हो सकता है।
योग और भारतीय दर्शन में चेतना की अवस्थाओं पर विभिन्न प्रकार से विचार किया गया है— जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय।
तुरीय को सामान्य तीन अवस्थाओं से परे चेतना की अवस्था के रूप में वर्णित किया जाता है।
ध्यान की गहराई को समझने के लिए इन अवस्थाओं का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण है।
ध्यान भीतर जागने की घटना है।
आठवाँ अंग — समाधि
और अंत में आता है..
अष्टांग योग की यात्रा का अंतिम अंग।
समाधि को केवल गहरी नींद या बेहोशी समझ लेना उचित नहीं है।
योग परंपरा में समाधि चित्त की अत्यंत गहन अवस्था है, जिसमें सामान्य मानसिक वृत्तियों का निरोध और ध्यान के विषय में चित्त का गहन अवगाहन वर्णित किया गया है।
पतंजलि योगसूत्र में समाधि के विभिन्न रूपों का विस्तृत विवेचन मिलता है।
परंपरा में सम्प्रज्ञात समाधि और असम्प्रज्ञात समाधि जैसे भेद भी बताए गए हैं।
सम्प्रज्ञात समाधि में चित्त की स्थूल और सूक्ष्म वृत्तियों के क्रमिक परिष्कार तथा एकाग्रता की अवस्थाओं का वर्णन मिलता है।
असम्प्रज्ञात समाधि में वृत्तियों के और अधिक सूक्ष्म निरोध की बात आती है।
चित्त का रूपांतरण।
यम से समाधि तक — एक पूरी यात्रा
अब एक बार पूरी यात्रा को देखिए…
इसलिए अष्टांग योग केवल ध्यान करने का तरीका नहीं है।
यह मनुष्य के भीतर एक क्रमिक यात्रा है।
उन्होंने पहले पात्र को तैयार किया…
फिर उस पात्र में ध्यान की खीर रखने की दिशा दिखाई।









