क्षणभंगुर: जीवन अभी है, बाद में नहीं
जीवन की क्षणभंगुरता को समझने और वर्तमान में जागने का आह्वान
जीवन बहुत छोटा है।
इतना छोटा कि तुम्हें सोचने का भी समय नहीं दिया गया, और तुमने उसे व्यर्थ चिंताओं में गंवा दिया।
एक श्वास आई,
एक श्वास गई…
और इसी के बीच तुम्हारी पूरी कहानी समाप्त हो सकती है।
चारों तरफ देखो—
युद्ध है,
महामारी है,
अशांति है।
मनुष्य ने बाहर भी नरक रच लिया है और भीतर भी।
हर क्षण अनिश्चित है।
कोई भरोसा नहीं कि अगला पल तुम्हारा होगा भी या नहीं।
फिर भी आश्चर्य है…
तुम ऐसे जी रहे हो जैसे अमर हो।
तुम वर्षों की योजनाएँ बनाते हो, भविष्य के सपने देखते हो और वर्तमान को टालते जाते हो।
होश कल पर टिका है,
जबकि जीवन केवल अभी है।
क्षणभंगुरता दुख नहीं, जागने का निमंत्रण है
क्षणभंगुरता कोई दुखद सत्य नहीं है।
यह तो सबसे बड़ा आह्वान है…
जागने का।
क्योंकि जो चला जाएगा, उसे पकड़ने की मूर्खता क्यों?
और जो अभी है, उसे जीने का साहस क्यों नहीं?
तुम्हें लगता है कि अभी समय है।
ध्यान बाद में करेंगे।
प्रेम बाद में करेंगे।
सत्य की खोज बाद में करेंगे।
लेकिन “बाद में” कभी आता नहीं।
मृत्यु हमेशा “अभी” में आती है।
जीवन केवल इस क्षण में है
होश का अर्थ है इस क्षण को पूरी तरह जी लेना।
बिना भय। बिना टालमटोल। बिना नींद के।
लेकिन तुम सोए हो।
आँखें खुली हैं।
जीवन चल रहा है।
पर भीतर कोई जागा नहीं है।
तुम जीवन को जी नहीं रहे, तुम केवल जीवन के गुजरने की प्रतीक्षा कर रहे हो।
और जीवन?
वह हर क्षण तुम्हारे हाथ से रेत की तरह फिसलता जा रहा है।
एक दिन सब छिन जाएगा
एक दिन सब छिन जाएगा—
तब शायद पछताओगे…
“जीते-जी क्यों नहीं जिए?”
लेकिन तब पछताने के लिए भी समय नहीं होगा।
इसलिए अभी।
इसी क्षण।
रुक जाओ।
एक गहरी साँस लो और देखो—
जीवन अभी तुम्हारे भीतर धड़क रहा है।
यही समय है।
यही अवसर है।
जो जाग गया, वही जी पाया।
जो सोया रहा, वह जीते-जी मर गया।









