अष्टांग योग — भाग 1

ध्यान से पहले शरीर और मन का शोधन क्यों आवश्यक है?

प्रिय मित्र,

आज मन में एक महत्वपूर्ण बात आई, तो सोचा आपके साथ साझा करूँ।

एकमात्र अपने अनुभूति आश्रम को छोड़कर, आज लगभग हर जगह ध्यान की धूम मची हुई है।

हर कोई ध्यान करवा रहा है…
हर कोई ध्यान कर रहा है…

और यहाँ?
यहाँ केवल ज्ञान की चर्चा हो रही है।

आखिर क्यों?

क्या मैं ध्यान का विरोधी हूँ?

कदापि नहीं!!

ध्यान अत्यंत उत्तम है।

लेकिन समस्या ध्यान में नहीं है।

समस्या यह है कि हम किसी भी बात को गहराई से जानना नहीं चाहते,

हम केवल किसी न किसी को मानना चाहते हैं।

और मित्र, मानना आसान है… जानना कठिन।

जानने में परिश्रम करना पड़ेगा।
अपने भीतर उतरना पड़ेगा।

अपने शरीर, मन, विचार और संस्कारों को देखना पड़ेगा।

मानने में कुछ करना ही नहीं है।

बस किसी के शब्दों के आगे अपना दिमाग गिरवी रख देना है।

क्या गंदी कटोरी में खीर खाएंगे?

मेरा एक बहुत साधारण प्रश्न है।

मान लीजिए आपकी रसोई के सिंक में तीन-चार दिन से एक कटोरी जूठी पड़ी है।

उसमें गंदगी चिपकी हुई है, दुर्गंध आ रही है।

और उसी कटोरी में आपको बहुत बढ़िया खीर खाने को दी जाए…

क्या आप खा लेंगे?

उसमें चाहे कितने ही काजू-बादाम डाल दिए जाएँ…

चाहे खीर कितनी ही स्वादिष्ट क्यों न हो…

आप उसे नहीं खाएँगे।

आखिर क्यों?

क्योंकि आप जानते हैं—

इस गंदी कटोरी में खीर खाने से हम बीमार पड़ सकते हैं।

तो मित्रों…

जिस शरीर रूपी कटोरी को हमने वर्षों से ठीक से साफ नहीं किया,

जिसमें विकार,
आलस्य,
असंतुलन और अशुद्ध जीवनशैली की गंदगी जमा होती रही…

उसमें हम सीधे ध्यान रूपी खीर कैसे डाल रहे हैं?

ध्यान से पहले शरीर और मन का शोधन

आप स्वयं देखिए…

कई लोग बहुत अधिक ध्यान कर रहे हैं,

फिर भी अनेक प्रकार की शारीरिक और मानसिक परेशानियों से जूझ रहे हैं।

आखिर क्यों?

क्योंकि ध्यान केवल आँखें बंद करके बैठ जाने का नाम नहीं है।

योग की परंपरा में ध्यान एक क्रम का हिस्सा है।

महर्षि पतंजलि ने अष्टांग योग में सबसे पहले यम और नियम रखे।

फिर आते हैं—

आसन→प्राणायाम→प्रत्याहार→धारणा→ध्यान→समाधि

ध्यान सातवें चरण में आता है।

तो प्रश्न यह है…

जब पतंजलि ने एक पूरा क्रम बनाया था, तो हमने उस क्रम को छोड़कर सीधे ध्यान को क्यों पकड़ लिया?

क्या हमें लगता है कि हजारों वर्षों की योग परंपरा को समझने की आवश्यकता नहीं है?

आज ध्यान सबसे पहले क्यों बिक रहा है?

आजकल जिसे देखो, वह सीधे ध्यान पर ही फोकस कर रहा है।

क्यों?

क्योंकि ध्यान सुनने में बहुत आकर्षक है।

बस आँखें बंद करो…

थोड़ी देर बैठो…

ध्यान करो…

और जीवन बदल जाएगा।

लेकिन योग कोई जादू की गोली नहीं है।

यदि शरीर और जीवनशैली अस्त-व्यस्त है,

यदि मन लगातार अशांत है,
यदि इंद्रियाँ बेलगाम हैं,

तो केवल ध्यान के नाम पर आँखें बंद कर लेना क्या पर्याप्त होगा?

और एक कड़वी बात कहूँ?

कई बार करवाने वाले का ध्यान साधना पर कम और व्यापार पर अधिक होता है।

उसे लोगों को आकर्षित करना है।

लोगों को जल्दी परिणाम का सपना दिखाना है।

और उसके बदले पैसे लेने हैं।

यदि वह पहले छह अंगों पर काम करवाएगा— यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार और धारणा— तो शायद अधिकांश लोग भाग जाएँगे।

क्योंकि वहाँ मेहनत करनी पड़ेगी।

और जहाँ मेहनत है, वहाँ भीड़ कम हो जाती है।

अष्टांग योग हमें क्या सिखाता है?

पतंजलि का अष्टांग योग केवल ध्यान करने की तकनीक नहीं है।

यह मनुष्य को भीतर से तैयार करने की एक क्रमिक यात्रा है।

पहले जीवन में अनुशासन आए।

फिर आचरण में शुद्धता आए।

शरीर स्थिर हो।

श्वास संतुलित हो।

इंद्रियाँ भीतर लौटें।

चित्त एकाग्र होना सीखे।

और तब…
ध्यान सहज होने लगता है।

यही कारण है कि सत्य को केवल मानना नहीं चाहिए।

उसे जानना चाहिए।

और जानने के लिए यात्रा करनी पड़ती है।

गंदी कटोरी में खीर…

अब उस कटोरी को फिर याद कीजिए।

यदि कटोरी साफ नहीं है तो खीर कितनी भी उत्तम क्यों न हो, आप उसे नहीं खाएँगे।

फिर अपने शरीर और मन के विषय में हम इतनी लापरवाही क्यों करते हैं?

क्या ध्यान से पहले पात्र को तैयार करना आवश्यक नहीं है?

और शायद इससे भी बड़ा प्रश्न..

क्या हम ध्यान चाहते हैं…
या केवल
“ध्यान करने वाला कहलाना चाहते हैं?”

सोचिएगा…
बहुत गहराई से सोचिएगा।

अस्तु…

भगवान सबको सद्बुद्धि प्रदान करें।

~~~ प्रभात पांडेय